शुक्रवार, 18 मार्च 2011

प्रेम-तत्त्व - उपहार ईश्वर का

प्रेम-तत्त्व



इस धरा पे मैं फिर जन्मा हूँ
मुझे उस तत्त्व कि तलाश है,
जो है सौम्य, अति मनभावन,
जो इस सृष्टि में विद्यमान है |

सोचता रहता हूँ क्या है वो
जिसे पाने पुनः अवतरित हुआ हूँ,
क्या वह वस्तु है? या कोइ भाव है?
सर्वत: जिससे वांछित रहा हूँ |

घोर नियम धर कड़ी तपस्या
क्यों ना मेरी फलीभूत हुई?
क्यूँ आया मैं इस धरा पे फिर से
क्यूँ ना मेरी परिपूर्ति हुई ?

सहसा हुई नुपुरों कि छन छन
अब वाम कोष झंकृत हुआ,
आती दिखी प्रियतमा मुझे तुम
इस सृष्टि का सार सार्थक हुआ |

नमन है तुमको हे वामांगी
बस तुम्हारी ही तलाश थी
युगों युगों से भूला था जिसे
सर्वत: मेरे तुम विद्यमान थी |

ज्ञात हुआ है अब यह मुझको
प्रेम ही सार है इस जीवन का ,
जो है परम सत्य, अति पावन
जो है परम तत्त्व इस जग का |

इस सृष्टि का अणु परमाणु
प्रीत द्वार का रागी है,
नभ के सूरज चाँद – सितारे
इस बात के साक्षी हैं |

गौलोक के मेरे स्वामी
राधा संग ही पूरण हैं ,
जब तक स्मरें ना हम राधे को
तब तक वे ना आते हैं |

स्पर्श तेरा करने जब आया
छम से घुल गई व्योम में तुम,
जागृत हुई मुझमें अब मृगतृष्णा
जिसकी तृप्ति थी केवल तुम |

बन हठयोगी अब मैं हठ साधी
तेरी प्राप्ति कि अब धुन लागी,
पावन राम नाम माला धर
तव नाम का हो गया मैं वैरागी |

प्रतिदिन प्रतिपल हर इक श्वास ले
नाम तेरा जपता रहता हूँ,
संजोग दिवस के मधुर क्षणों का
नित चिंतन करता रहता हूँ |

हर उद्यान के हर इक पुष्प में
तेरे मुख का दर्शन है ,
सुंदर निश्चल मधुर खगोँ का,
राग तेरा ही दर्पण है |

चहुँ दिशा से बहती वायु
स्पर्श तेरा मुझे करवाती है,
और इस मंद पवना के शुभ कर
प्रेम कलश तेरा छलकातीं है |

अब तक नैन टिकाये हूँ मैं
उस ही सुंदर से पथ पे ,
मेरे अवतरण के उत्तर हेतु
संजोग हुआ था जहाँ तुझसे |

सहस्त्र सूर्यों सी आभा जागी
आयी पुनः तुम उस पथ पे,
अब होगा तप मेरा परिपूरण
हमारे मिलन कि वेला पे |

हे प्रियतमा , हे अर्धांगिनी,
धन्य हो तुम यह तत्त्व धरे,
पुरुष तत्त्व की पूर्ति तुम करती,
यह ब्रह्मांड है तुमसे चले |

अति शीघ्र अब तुम आ जाओ
तनिक भी मत विलंब करो,
अपनी शक्ति का ‘इ’ मुझको दे,
शव से मुझे शिव कर दो |

अति शीघ्र अब तुम आ जाओ
तनिक भी मत विलंब करो,
अपनी शक्ति का ‘इ’ मुझको दे,
शव से मुझे शिव कर दो |
  

तिरस्कार - एक पराजित भूचर की गाथा

तिरस्कार



जन्म मरण के चक्र के कारण
मैं फिर धरती पे आया था,
ले प्रथम श्वास मैं रो पड़ा
जग सारा मस्ती में झूम रहा था |

पूर्वजनम के कर्मों की रश्मि
नवग्रह मुझपर डाले थे,
सुख, दुख, दंड और पुरस्कार लिए
कालचक्र में विराजित थे |

पूछता हूँ उस रचनाकार से मैं,
क्या संचित कर मैं लाया था,
पृथ्वी जैसे मधुर लोक में क्यूँ उसने
नरक सा वात फैलाया था |

मेरी उपस्थिति और इच्छायें
क्यूँ ना किसी को भाती थीं,
तेरी दी इस काया में क्यूँ
इक अबोध कन्या कराहती थी |

प्रश्न दिए वो, जो थे निरुत्तर,
इच्छायें दी वो, जो ना हों कभी तृप्त,
क्यूँ दिया वो संगीत तूने
थी नृत्य कृति जिसपर धिक्कृत |

मेरे आसपास सारा जनमानस,
मुझे तनिक ना भाता था,
रत्ती भर भी ना मुझे स्वीकारते
बस अब उनसे नफ़रत करता था |

उपहासयुक्त वो कुत्सित चेहरे
तीक्ष्ण प्रहार करते थे,
नित दिन प्रतिपल वो पापी जन
मुझमें विष फैलाते थे |

अपमान , कटाक्ष की निर्दय दलदल
धीमे धीमे निगलती रहती,
काबू कर हर अंग, मुझ कठपुतली के
कराल नाट्य ,कुकृति करती |

हुये स्पंदन अब अल्प गति के
खाली पात्र था वीर्य कोष,
काक चुनरिया रात्रि सी अंधी
जकड़ गयी सारा संतोष|

पाता जगत ये जिसे सहज से
उसकी प्राप्ति थी मेरी लड़ाई,
लड़ लड़ कर जब हुआ मैं कायर
प्राप्ति नाम ने ली विदाई |

हुई अपनी आत्मा भी दूर अब मुझसे
अब मैं भी अपना शत्रु था,
अपने मुख से स्वयं की निंदा कर
खुद पे वार मैं करता था |

छिन गया बचपन, छिन गया यौवन
छिन गया अब सबकुछ मुझसे,
त्राहि त्राहि मैं चीखता रहता
माथा फोड़ तेरे दर पे |

रात्रिकाल के अंधकार में
हस्त ना जाने क्या टटोलते,
पत्थर मार, कोयले से गगन पे
निद्रा धरा की भंग करते |

क्या मैं करता, क्यूँ मैं करता
हर करम था उद्देश्यहीन,
तिरस्कार के पिशाच पाश में
हो गया था मैं बलहीन |

हे दयानिधे, हे कृपानिधान
दो में से इक वर दे दो,
भाग्य मेरा जागृत कर दो
या ये काया मेरी नष्ट कर दो |

हे दयानिधे, हे कृपानिधान
दो में से इक वर दे दो,
भाग्य मेरा जागृत कर दो
या ये काया मेरी नष्ट कर दो |

संकलित द्वारा :
देवांशु कश्यप

प्रतीक्षा - देवदास के इंतज़ार में पारो की दिनचर्या

प्रतीक्षा

सिलसिला ये चाहत का,
ना दिल से बुझने दिया|



तेरी राह निहारें नैना
इस दीये की लौह पे,
बीते मेरा इक इक पल
देख तुझे उजले चमके |

गिनूं साँस चारों पहर मैं,
पलकें बिछाए उस पथ पे,
लगता है जहाँ देख मुझको
मिलूँगी मैं कभी तुझसे |

नाव प्रभात फिर महक उठी है
तेज़ रश्मियाँ भी संग हैं,
चीख ज़ोर से कहें जो मुझसे
“देख तो! वह आया है” !

मचल गयी मैं दौड़ी नीचे
उस चंचल तितली जैसी,
भागें जो कलियों के पीछे
पुष्प रसाल की तलाश में |

इस अतिशुभ दुर्लभ मुहूर्त में
क्रंदन ध्वनियाँ हैं हुईं झँकृत,
कराल काल की रूदित वाणी
अब ना होंगी मन में निर्मित |

हे जलधर, शिवप्रिय मेरे मेघा
भीतर अपने तू पुष्प भर ले,
स्वागत में मेरे प्रियतम के
हर्षित होकर पाती कर दे |

सलोने सुमधुर इस उत्सव पर
भगवती आलय सुसज्जित करूँगी,
सुहागन साक्षी तेरे प्रिय सिंधूर की
लालिमा से व्योम रंजित कर दूँगी |

लुप्त हो गयी क्यूँ ये रोशनी ?
घटायें हुईं क्यूँ तुम काली ?
राग हुये क्यूँ पुनः भयंकर ?
कहाँ गयी उत्सव की लाली ?

इतः ततः मेरे ये प्रकृति
क्षण भर में हो उठी जीवित,
उसका कटाक्ष मेरे इस भ्रम पर
कर रहा था मुझको पीड़ित |

क्रूरा आँधी अपने कुकरों संग
पहुँची दीये की लौह की ओर,
अथाह वार कर हुई पराजित
सहमी गयी दुर्गति के छोर|

दुष्कर मेघों के शस्त्र वारुणी
हर ना सके मेरे दीये के प्राण,
बरस बरस वो मृत्यु दर पहुँचे
पर गयी ना मेरे व्रत प्रतीक की शान|

अपने कक्ष के द्वार से अब भी
कर रही हूँ मैं, पथ अवलोकन,
बालकपन की उस जुदाई का
अब तक है देवा, मुझे स्मरण|

जन्मों सम इन दिवसों में मैं
सदियों सम, होरों में जीती हूँ,
प्रतिपल दुर्गम प्रतीक्षा में तेरे
आगमन आशा में रहती हूँ |

भेजे तुम्हारे सभी पत्रों का
नियमित पठन मैं करती हूँ,
उन पत्रों में गूँथी सुगंधि से
आलिंगन तुम्हारा करती हूँ |

मटियाली गोधुलि वेला में जब
मंदिरों में गायन होते हैं ,
धर दीया तेरा, मन आलय में अपने
पूजन तेरे ही होते हैं |

सूर्यास्त की अंतिम किरणों पे
जब काली चुनरिया लहराती है,
जडित उसमें सभी रत्नों के संग
आभा तेरी बढ़ जाती है |

आगामी दिवस में तेरे दर्शन की
आस लगाए रहती हूँ,
कर पूजन अपने व्रत प्रतीक की
लौह को देखती रहती हूँ |

निर्दयी है बहुत यह विष वियोग का
हर रहा है ये मेरे प्राण,
आ जाओ तुम इस से पहले
लग जाए मेरे श्वासों पे विराम |

निर्दयी है बहुत यह विष वियोग का
हर रहा है ये मेरे प्राण,
आ जाओ तुम इस से पहले
लग जाए मेरे श्वासों पे विराम |